कुछ हम को ज़माने ने वो गीत सुनाये हैं

कुछ हम को ज़माने ने वो गीत सुनाये हैं
दो अश्क मोहब्बत के आंखों में समाये हैं ।

माना के मुलाकातों का वक्त नहीं आया
हर रात को ख़्वाबों में तशरीफ वो लाये हैं ।

इनकार की आदत तो दिलबर को नहीं मेरे
ये बात अलग है कि वादे न निभाये हैं ।

करते थे कभी उन की सूरत से बहुत बातें
कैसे कह दें हमने वो लम्हे गंवाए हैं ।

रू-ब-रू कभी उन का दीदार न कर पाये
बे-परदा खलिश आख़िर मय्यत पे वो आए हैं ।

Comments

  1. इनकार की आदत तो दिलबर को नहीं मेरे
    ये बात अलग है कि वादे न निभाये हैं ।

    बहोत खूब सुंदर लिखा है जारी रहे...............

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